श्री गायत्री चालीसा- Shri Gayatri Chalisa

श्री गायत्री चालीसा(Shree Gayatri Chalisa)

दोहा

जयति जयति अम्बे जयति,यज्ञ गायत्री देवी ।
ब्रह्मज्ञान धारनी ह्रदय, आदिशक्ति सुरसेवी ।।

चौपाई

जयति जयति गायत्री अम्बा । काटहु कष्ट न करहु बिलम्बा ।।
तव ध्यावत विधि विष्णु महेशा । लहत अगम सुख शांति हमेशा ।।

तू ही ब्रह्मज्ञान उर धारिणी । जग तारिणी मगमुक्ति प्रसारिणी ।।
जन तन संकट नाशनि हारी । हरणी पिशाच प्रेत दै तारी ।।

मंगल मोद भरणी भय नाशनी । घट-घट वासिनी बुद्धि प्रकाशिनि ।।
पूरन ज्ञान रत्न की खानी, सकल सिद्धि दानी कल्याणी ।।

शंभू नेत्र नित निर्त करैया । भव भय दारुण दर्प हरैया ।।
सर्व काम क्रोधादिक माया । ममता मत्सर मोह अदाया ।।

अगम अनिष्ट हरन महाशक्ति । सहज भरण भक्तन उर भक्ति ।।
ॐ रूप कलि कलुष विभंजनि । भूर्भवः स्व: स्वतः निरंजनि ।।

शब्द ‘तत् सवितुः’ हंस सवारी । अरु ‘वरेण्यम्’ ब्रह्मदुलारी ।।
‘भर्गो ‘जन तनु क्लेश नशावत । प्रेम सहित ‘ देवस्य ‘ जु ध्यावत ।।

‘ धीमहि ‘ धीर धरत उरमाही । ‘ धियो ‘ बुद्धिबल विमल सुहाही ।।
‘ योन: ‘ नित नवभक्ति प्रकाशन । ‘ प्रचोदयात् ‘ पुंज अघनाशन ।।

अक्षर अक्षर महं गुण रूपा । अगम अपार सूचरित अनूपा ।।
जो गुण शास्त्र न तुम्हारो जाना । शब्द अर्थ जो सुना न नाना ।।

सो नर दुर्लभ अस तन पावत । कनक घटन पापस करि डारत ।।
जब लगि ब्रह्म कृपा नहीं तेरी । रहहि तबहि लगि ज्ञान की देरी ।।

प्रकृति ब्रह्म शक्ति बहुतेरी । महा व्याह्रति नाम घनेरी ।।
ॐ तत्व निर्गुण जग जाना । भू: मही रूप चतुर्दल माना ।।

भुवः भुवन पालन शुचिकारी । स्व: अक्षर सोलह दल धारी ।।
‘तत् ‘ विधिरूप जन दुखहारी । ‘ स ‘ रस रूप ब्रह्म सुखकारी ।।

‘वि’ रचित गंध शिशिर संयुक्ता ।। ‘तुर्’ मित घट-घट जीवन मुक्ता ।।
‘व’ नत शब्द सुविग्रह कारण । ‘रे’ स्वशरीर तत्वयुत धारण ।।

‘ण्यम्’ सर्वत्र सुपालन कर्त्ता । ‘भर’ त्रिभुवन मुद मंगल भर्ता ।।
‘गो’ संयुक्त गंध अविनाशी । ‘दे’ तन बुद्धि वचन सुख रासी ।।

‘व्’ सत् ब्रह्म सुबाहु स्वरुपा । ‘स्य’ तनु लसै शतदल अनुरूपा ।।
‘धी’ जनु प्रकृति शब्द नित कारण । ‘म’ नित ब्रह्मरूपिणी धारण ।।

‘हि’ जहि सर्व ब्रह्म प्रकाशन । ‘धियो’ बुद्धि बल विद्या वासन ।।
‘यो’ सर्वत्र लसत थल जल निधि । ‘न:’ नित तेज पुंज जग बहु विधि ।।

‘प्र’ बल अनिलकाय नित कारन । ‘चो’ परिपूर्ण सिव श्री धारन ।।
‘द’ मन करति प्रगट अघ शक्ति । ‘यात” प्रबेस करे हरि भक्ति ।।

जयति-जयति जय-जय जगधात्री । जय जय महामंत्र गायत्री ।।
तू ही राधिका सीता । तू श्रीकृष्ण निसृत श्री गीता ।।

आदिशक्ति तू भक्ति भवानी । जगत जननी फल वांछित दानी ।।
तू ही दुर्गा दुर्ग विनसिनि । उमा रमा वैकुण्ठ निवासिनि ।।

तू श्री भक्ति भैरवी दानी ।तुही मातु मंगल मिरदानी ।।
जेते मंत्र जगत में माहीं । पर गायत्री सम कोई नाहीं ।।

जाहि ब्रह्म हत्यादिक लागै। गायत्रिही जप सो अघ भागै ।।
धनि हो धनि त्रैलोक्य वंदिनि । जय हो जय श्री ब्रह्मनंदिनी ।।

दोहा

श्री गायत्री चालीस पाठ करै सानंद । सहज तरै पातक हरै, परै न पुनि भव फंदि ।।
बास होई ग्रह लक्ष्मी गहि मन वांछित आस । आस पुरन लहि सकल विरच्यो सुन्दरदास।।

गायत्री चालीसा अर्थ सहित (Gayatri chalisa with Meaning)

दोहा

जयति जयति अम्बे जयति,यज्ञ गायत्री देवी ।
ब्रह्मज्ञान धारनी ह्रदय, आदिशक्ति सुरसेवी ।।

हे माँ यज्ञदेवी , ब्रह्मज्ञान को हृदय में धारण करने वाली देवो द्वारा सेवित आदिशक्ति आपकी जय जयकार हो ।

चौपाई

जयति जयति गायत्री अम्बा । काटहु कष्ट न करहु बिलम्बा ।।
तव ध्यावत विधि विष्णु महेशा । लहत अगम सुख शांति हमेशा ।।

हे जगतजननी माता गायत्री आपकी बारम्बार जय हो , आप अविलम्ब मेरे कष्टों को दूर करें । ब्रह्मा विष्णु और महेश भी आपका ध्यान कर सदैव सुख और शांति का अनुभव करते हैं ।

तू ही ब्रह्मज्ञान उर धारिणी । जग तारिणी मगमुक्ति प्रसारिणी ।।
जन तन संकट नाशनि हारी । हरणी पिशाच प्रेत दै तारी ।।

आप हृदय में ब्रह्मज्ञान को धारण कर जगत का उद्धार और मुक्ति के मार्ग प्रशस्त करने वाली हैं। आप भक्तो के दुखो को हरने वाली और प्रेत और पिसाच को दूर भागने वाली हैं ।

मंगल मोद भरणी भय नाशनी । घट-घट वासिनी बुद्धि प्रकाशिनि ।।
पूरन ज्ञान रत्न की खानी, सकल सिद्धि दानी कल्याणी ।।

आप मंगल और आनंद देने वाली तथा समस्त भयों का नाश करने वाली हैं । आप कण कण में व्याप्त और बुद्धि को प्रकाशित करती हैं । आप ज्ञानरूपी रत्नो की खान हैं और ही कल्याणी ! आप ही सभी सिद्धियों को देने वाली हैं ।

शंभू नेत्र नित निर्त करैया । भव भय दारुण दर्प हरैया ।।
सर्व काम क्रोधादिक माया । ममता मत्सर मोह अदाया ।।

शिव के तीसरे नेत्र में ज्ञान र्रोप में स्थित होकर आप संसार के भय और अहंकार को हरने वाली हैं । सभी प्रकार की कामनाएं, क्रोध , ममता, मोह का आप हरण करने वाली हैं ।

अगम अनिष्ट हरन महाशक्ति । सहज भरण भक्तन उर भक्ति ।।
ॐ रूप कलि कलुष विभंजनि । भूर्भवः स्व: स्वतः निरंजनि ।।

हे महाशक्ति ! आप अगम हैं आप सभी के अनिष्ट को हरण करके भक्तो के हृदय में भक्ति जाग्रत करती हैं । कलिकाल( कलियुग ) के पापों को नष्ट करने वाला दिव्या मंत्र ‘ॐ’ आप हैं। भूः भुवः स्वः रूप में आप सभी दोषो से मुक्त हैं ।

शब्द ‘तत् सवितुः’ हंस सवारी । अरु ‘वरेण्यम्’ ब्रह्मदुलारी ।।
‘भर्गो ‘जन तनु क्लेश नशावत । प्रेम सहित ‘ देवस्य ‘ जु ध्यावत ।।

‘तत् सवितुः’ शब्द यह इंगित करता है कि हंस अथवा सूर्य आपका वहां हैं और ‘वरेण्यम’ यह बताता है कि आप ब्रह्मदेव की प्रिय पुत्री हैं । ‘भर्गो’ शब्द से आप भक्तों के शारीरिक कष्टों का नाश करती हैं । ‘देवस्य’ यह बतलाता है की देवता भी प्रेम पूर्वक आपका ध्यान करते हैं ।

‘ धीमहि ‘ धीर धरत उरमाही । ‘ धियो ‘ बुद्धिबल विमल सुहाही ।।
‘ योन: ‘ नित नवभक्ति प्रकाशन । ‘ प्रचोदयात् ‘ पुंज अघनाशन ।।

‘धीमहि’ मानव मन को धीरवान बनता है। ‘धियो’ से बुद्धि और बल निर्मल होता है । ‘योनः’ से नित नए भक्ति का प्रकाश होता है और ‘प्रचोदयात’ यह घोसित करता है की आप सभी पाप-पुंजों का नाश करने वाली हैं।

अक्षर अक्षर महं गुण रूपा । अगम अपार सूचरित अनूपा ।।
जो गुण शास्त्र न तुम्हारो जाना । शब्द अर्थ जो सुना न नाना ।।

गायत्री का प्रत्येक अक्षर मेरी शक्ति और सौंदर्य से भरा है। वह अपार अनिर्वचनीय और अनुपम है। जिसने आपके गुणों और उसके विज्ञानं को न जाना जिसने आपके शब्दों और उसके अर्थो को न जाना –

सो नर दुर्लभ अस तन पावत । कनक घटन पापस करि डारत ।।
जब लगि ब्रह्म कृपा नहीं तेरी । रहहि तबहि लगि ज्ञान की देरी ।।

वो मनुष्य अपने दुर्लभ मानव शरीर को पाकर भी अपने सोने के घड़े को पाप का घड़ा बना डाला। हे ब्रह्मरूपा ! जब तक आपकी कृपा नहीं होती तब तक ज्ञान के उदय में विलम्ब ही होता है ।

प्रकृति ब्रह्म शक्ति बहुतेरी । महा व्याह्रति नाम घनेरी ।।
ॐ तत्व निर्गुण जग जाना । भू: मही रूप चतुर्दल माना ।।

आपकी प्रकृति ब्रह्मा शक्ति ‘ॐ भूः भुवः स्वः’ तीन सूक्ष्म महाव्याहतियों में दिखाई पड़ती है। अखिल ब्रह्माण्ड यह जानता है कि ॐ निर्मल तत्व का प्रतीक है और ‘भूः’ पृथ्वी के चतुर्दलीय रूप का प्रतीक है ।

‘भुवः’ भुवन पालन शुचिकारी । ‘स्व:’ अक्षर सोलह दल धारी ।।
‘तत् ‘ विधिरूप जन दुखहारी । ‘ स ‘ रस रूप ब्रह्म सुखकारी ।।

‘भुवः’ उसका प्रतीक है जो विश्व का पालन करके उसे पवित्र बनता है । ‘स्वः’ अक्षर में सोलह दाल हैं । ‘तत्’ जहाँ भाग्य रुपी जगत के दुखों को हरने वाले का प्रतीक है वहीं ‘स’ सुखकारी रास रूप ब्रह्मा का।

‘वि’ रचित गंध शिशिर संयुक्ता ।। ‘तुर्’ मित घट-घट जीवन मुक्ता ।।
‘व’ नत शब्द सुविग्रह कारण । ‘रे’ स्वशरीर तत्वयुत धारण ।।

‘वि’ से गंध युक्त शिशिर का प्रतिबिम्बन होता है। ‘तुर्’ घट घट में व्याप्त जीवन्मुक्त रूप आत्मा कि व्यंजना करता है । ‘व’ शब्द से सुन्दर शरीर के कारण का बोध होता है जबकि ‘रे’ से तत्व युक्त शरीर को धारण करने वाले का।

‘ण्यम्’ सर्वत्र सुपालन कर्त्ता । ‘भर’ त्रिभुवन मुद मंगल भर्ता ।।
‘गो’ संयुक्त गंध अविनाशी । ‘दे’ तन बुद्धि वचन सुख रासी ।।

‘ण्यम्’ से पालनकर्ता कि व्यंजना होती है और ‘भर’ से सभी सुखद मंगलो के स्वामी की। ‘गो’ से विभिन्न अविनाशी गंधों का बोध होता है तो ‘दे’ से तन, बुद्धि और वचन की सुखरूपता का।

‘व्’ सत् ब्रह्म सुबाहु स्वरुपा । ‘स्य’ तनु लसै शतदल अनुरूपा ।।
‘धी’ जनु प्रकृति शब्द नित कारण । ‘म’ नित ब्रह्मरूपिणी धारण ।।

‘व’ से लम्बी भुजाओं वाले ब्रह्मा की सत्ता का बोध होता है तथा ‘स्य’ से शतदल कमल से सुन्दर शरीर का। ‘धी’ से प्रकृति के कारण रूप शब्द रूप में व्यक्त होने वाले ब्रह्मा का बोध होता है, जबकि ‘म’ से उसके नाना नाम रूपों में व्यक्त होने का।

‘हि’ जहि सर्व ब्रह्म प्रकाशन । ‘धियो’ बुद्धि बल विद्या वासन ।।
‘यो’ सर्वत्र लसत थल जल निधि । ‘न:’ नित तेज पुंज जग बहु विधि ।।

‘हि’ से जगत में ब्रह्म रुपी प्रकाश फैलता है । ‘धियो’ से इस बात का की गायत्री का निवास बुद्धि बल और विद्या में है। ‘यो’ से ज्ञात होता है की गायत्री जड़ प्रकृति में व्याप्त है जबकि ‘नः’ से समस्त जगत में उनके तेज का व्याप्त होना सिद्ध होता है।

‘प्र’ बल अनिलकाय नित कारन । ‘चो’ परिपूर्ण सिव श्री धारन ।।
‘द’ मन करति प्रगट अघ शक्ति । ‘यात” प्रबेस करे हरि भक्ति ।।

‘प्र’ जीवन देने वाली प्रबल वायु का सूचक है । और ‘चो’ स्वयं में परिपूर्ण मांगलिक सुन्दर रूप का। ‘द’ से पाप शक्तियों का दमन करने वाली गायत्री का बोध होता है । जबकि ‘यात’ से प्रभु विष्णु की भक्ति का ।

जयति-जयति जय-जय जगधात्री । जय जय महामंत्र गायत्री ।।
तू ही राधिका सीता । तू श्रीकृष्ण निसृत श्री गीता ।।

ये जगत का पोषण करने वाली धात्री ! आपकी जय हो। हे मंत्रो के मन्त्र गायत्री मंत्र ! आपकी जय जयकार हो। आप हि श्रीराम, राधिका और सीता हैं, आप हि श्रीकृष्ण के मुख से निकली गीता हैं।

आदिशक्ति तू भक्ति भवानी । जगत जननी फल वांछित दानी ।।
तू ही दुर्गा दुर्ग विनसिनि । उमा रमा वैकुण्ठ निवासिनि ।।

आप ही आदिशक्ति हैं तथा भक्ति और भवानी भी हैं। हे जगतजननी ! आप हि मनोवांछित फल की दात्री हैं। आप हि विपद विनाशिनी दुर्गा हैं और विष्णुलोक में निवास करने वाली उमा उमा रमा भी।

तू श्री भक्ति भैरवी दानी । तुही मातु मंगल मिरदानी ।।
जेते मंत्र जगत में माहीं । पर गायत्री सम कोई नाहीं ।।

आप ही लक्ष्मी, उदार भैरवी, मंगलमयी माता और शिव शक्ति मृडानी हैं। संसार में जितने भी मंत्र हैं उनमे से कोई भी मंत्र गायत्री मंत्र के सामान नहीं है ।

जाहि ब्रह्म हत्यादिक लागै। गायत्रिही जप सो अघ भागै ।।
धनि हो धनि त्रैलोक्य वंदिनि । जय हो जय श्री ब्रह्मनंदिनी ।।

जो ब्रह्महत्या करने का दोषी है, वह भी गायत्री मन्त्र के जाप से मुक्त हो जाता है । हे त्रिलोक की वंदनीय गायत्री ! आप धन्य हैं। हे ब्रह्मनन्दिनी आपकी जय जयकार हो।

दोहा

श्री गायत्री चालीस पाठ करै सानंद । सहज तरै पातक हरै, परै न पुनि भव फंदि ।।
बास होई ग्रह लक्ष्मी गहि मन वांछित आस । आस पुरन लहि सकल विरच्यो सुन्दरदास।।

गायत्री चालीसा का आनंद से पाठ करने वाला पाप संतापों से मुक्त हो जाता है। इस भवसागर से तर जाता है और फिर कभी मृत्युलोक में जन्म नहीं लेता है। सुन्दरदास की इस रचना का जो पाठ कर्ता है, उसके घर लक्ष्मी का वास होता है उसकी सभी काम नायें पूर्ण होती हैं।

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1 COMMENT

  1. मातृभाषा हिंदी में परिचय , दोहा , चौपाई , आरती , मंत्र और चालीसा का आपका यह त्रुटि रहित प्रयास अत्यंत सराहनीय होने के साथ – साथ अनुकरणीय भी है , आगे भी आप इसी तरह चालीसा संग्रह के पाठकों के लिए सम्पूर्ण चालीसा संग्रह उपलब्ध कराएं यह निवेदन हैं .. मां गायत्री की कृपा आप पर सदैव बानी रहें यही शुभकामना है ।

    धन्यवाद

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