shri ram stuti with meaning- राम स्तुति अर्थ सहित 

Shri Ram stuti - श्री राम स्तुति

आज हम लोग भगवान् श्री राम को याद करना होता है तो कैसे करते हैं – जय श्री राम, हे राम, रामचंद्र जी की जय.

क्या आपको पता है की पुरातन काल में जब श्रीश्री और महर्षि भगवान् राम को कैसे याद करते थे। 
वो भगवान् राम की स्तुति करते थे 
आइये आज हम आपको बताते है राम स्तुति के बारे में अर्थ सहित जो स्वयं तुलसीदास जी ने लिखी है। 

श्री राम चंद्र कृपालु भजमन हरण भाव भय दारुणम्।
नवकंज लोचन कंज मुखकर, कंज पद कन्जारुणम्।।

कंदर्प अगणित अमित छवी नव नील नीरज सुन्दरम्।
पट्पीत मानहु तडित रूचि शुचि नौमी जनक सुतावरम्।।

भजु दीन बंधु दिनेश दानव दैत्य वंश निकंदनम्।
रघुनंद आनंद कंद कौशल चंद दशरथ नन्दनम्।।

सिर मुकुट कुण्डल तिलक चारु उदारू अंग विभूषणं।
आजानु भुज शर चाप धर संग्राम जित खर-धूषणं।।

इति वदति तुलसीदास शंकर शेष मुनि मन रंजनम्।
मम ह्रदय कुंज निवास कुरु कामादी खल दल गंजनम्।।

॥ छंद ॥

मनु जाहिं राचेऊ मिलिहि सो बरु सहज सुंदर सावरों।
करुना निधान सुजान सिलू सनेहू जानत रावरो।।

एही भांती गौरी असीस सुनी सिय सहित हिय हरषी अली।
तुलसी भवानी पूजि पूनी पूनी मुदित मन मंदिर चली।।

।।सोरठा।।

जानि गौरी अनुकूल सिय हिय हरषु न जाइ कहि।
मंजुल मंगल मूल वाम अंग फरकन लगे।।

Shri Ram stuti with meaning - श्री राम स्तुति अर्थ सहित

श्री राम चंद्र कृपालु भजमन हरण भाव भय दारुणम्।
नवकंज लोचन कंज मुखकर, कंज पद कन्जारुणम्।।

श्रीराम जो कि सभी पर कृपा व दया करने वाले हैं, मेरा मन उनके भजन करता हैं। श्रीराम हम सभी के मन से इस विश्व के जन्म-मरण रुपी भय को दूर करते हैं। श्रीराम के नेत्र नए खिले हुए कमल पुष्प के समान हैं। उनके हाथ, मुख व चरण भी लाल कमल के समान सुंदर हैं।

कंदर्प अगणित अमित छवी नव नील नीरज सुन्दरम्।
पट्पीत मानहु तडित रूचि शुचि नौमी जनक सुतावरम्।।

उनका रूप असंख्य कामदेवों से भी सुंदर व मनमोहक हैं। उनके शरीर का रंग नए बने हुए घने नीले बादल के समान हैं। उनका पीताम्बर मेघ रुपी शरीर बिजली के समान चमक रहा हैं। वे जनक पुत्री माता सीता के पति हैं।

भजु दीन बंधु दिनेश दानव दैत्य वंश निकंदनम्।
रघुनंद आनंद कंद कौशल चंद दशरथ नन्दनम्।।

श्रीराम याचकों के मित्र हैं, वे विश्व के लिए प्रकाश हैं, वे राक्षसों का कुल सहित नाश कर देते हैं, वे रघुकुल की संतान हैं, वे आनंद प्रदान करने वाले हैं, वे माँ कौशल्या के पुत्र हैं, वे राजा दशरथ के नंदलाल हैं, मेरा मन उनका ध्यान करता हैं।

सिर मुकुट कुण्डल तिलक चारु उदारू अंग विभूषणं।
आजानु भुज शर चाप धर संग्राम जित खर-धूषणं।।

उन्होंने मस्तक पर मुकुट धारण किया हुआ हैं, कानों में कुण्डल हैं तो माथे पर तिलक लगाए हुए हैं, उनके पूरे शरीर पर रत्न जड़ित आभूषण हैं। उन्होंने अपनी दोनों विशाल भुजाओं में धनुष-बाण धारण किया हुआ हैं और उन्होंने युद्ध में खर-दूषण पर विजय पा ली हैं।

इति वदति तुलसीदास शंकर शेष मुनि मन रंजनम्।
मम ह्रदय कुंज निवास कुरु कामादी खल दल गंजनम्।।

तुलसीदास जी कहते हैं कि श्रीराम भगवान शिव, शेषनाग व साधु-मुनियों के मन को प्रसन्न करने वाले हैं। हे श्रीराम! आप मेरे हृदय में कमल के पुष्प की भांति निवास करो और मेरे मन से इच्छा-काम आदि सभी बुराइयों को निकाल दो।

॥ छंद ॥
 
मनु जाहिं राचेऊ मिलिहि सो बरु सहज सुंदर सावरों।
करुना निधान सुजान सिलू सनेहू जानत रावरो।।
 
अर्थ – जिसमे तुम्हारा मन आकर्षित हो गया है एवं उसकी छवि तुम्हारे ह्रदय में बैठ गयी है, वही स्वभाव से सहज और सुन्दर सांवले वर तुम्हे प्राप्त होंगे। वह दया के सागर हैं और सूजन है अर्थात सभी को जानने और समझने वाले हैं। वह सभी जगह में निवास करते हैं, तुम्हारे शील और मर्यादा, प्रेम व अनुराग को जानने वाले हैं। 
 
एही भांती गौरी असीस सुनी सिय सहित हिय हरषी अली।
तुलसी भवानी पूजि पुनि पुनि मुदित मन मंदिर चली।।
 
अर्थ – इस तरह माता गौरी जी का आशीर्वाद सुनकर जानकी जी सहित समस्त सखियाँ ह्रदय से प्रफुल्लित हो गयीं। तुलसीदास जी कहते हैं –  सीताजी मन से बहुत खुश होती हैं और माता भवानी को पूजकर के राजमहल की ओर चली जाती हैं। 
 
।।सोरठा।।
 
जानि गौरी अनुकूल सिय हिय हरषु न जाइ कहि।
मंजुल मंगल मूल वाम अंग फरकन लगे।।
 
अर्थ  – 
गौरी जी के अनुकूल वचनो को सुनकर सीता माता को जो ख़ुशी हुयी वो शब्दों में व्यक्त नहीं किया जा सकता है। सुन्दर मंगलों के मूल उनके बाए अंग भी फड़कने लगें जिससे उन्हें आभास हो गया की उनकी ये कामना सिद्ध होने वाली है। 
 
।। बोलो सियाबर रामचंद्र की जय।। 
 

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